रविवार, 29 मार्च 2015

तप, दान और कर्म के प्रकार

मन, वाचा और कर्म से अर्थात मनुष्य मन से वाणी से और शरीर के कर्म से तीन प्रकार के यज्ञ, दान, तप , ज्ञान , कर्मादि करता हैं । सतोगुणी, रजोगुणी और तमोगुणी । यह सब ही तीन प्रकार के होते हैं अत: इन सबकी उत्तमता व निकृष्टता इनके गुणों भेद से बदल जाती है - भगवान श्री कृष्ण , श्रीमद्भगवद गीता

सोमवार, 3 मई 2010

पशु से इंसान बने और बने फिर इंसान से पशु

पशु से इंसान बने और बने फिर इंसान से पशु

सबकी गति है एक सी अंत समय पर होय, जो आये हैं जायेंगे राजा रंक फकीर । जनम होत नंगे भये, चौपायों की चाल , न वाणी न वाक्‍य थे पशुवत पाये शरीर । धीरे धीरे बदल गये चौपायों से बन इंसान । वाक्‍य और वाणी मिली वस्‍त्र पहन कर हुये बने महान । जाति बनी और ज्ञान बढ़ा तो बॉंट दिया फिर इंसान । अंत समय नंगे फिर भये, गये सब वेद शास्‍त्र और ज्ञान ।।   

 

गुरुवार, 9 जुलाई 2009

मंत्री अथवा गुरू किसे बनायें

जिसमें सत्‍य को सत्‍य एवं असत्‍य को असत्‍य कहने का साहस हो, जो चाटुकारिता में नहीं बल्कि राज्‍यहित में विश्‍वास रखता हो, जो मान अपमान से परे हो, जिसे धन का लोभ न हो, जो कंचन व कामिनी से अप्रभावित रहे उसी व्‍यक्ति को राजा को अपना मंत्री अथवा गुरू नियुक्‍त करना चाहिये - चाणक्‍य नीति

श्रेष्‍ठत्‍व प्राप्‍त करने के उपाय

अच्‍छा वक्‍ता बनना है तो अच्‍छे श्रोता बनो, अच्‍छा लेखक बनना है तो अच्‍छे पाठक बनो, अच्‍छा गुरू बनना है तो अच्‍छे शिष्‍य बनो, अच्‍छा राजा बनना है तो अच्‍छा नागरिक बनो अच्‍छा स्‍वामी बनना है तो अच्‍छे नौकर बनो - संकलित  

 

शनिवार, 20 दिसंबर 2008

विषय पर जानकारी कितनी

कई विषयों के बारे में थोडा थोडा ज्ञान होने से बेहतर है कि केवल कुछ या केवल एक विषय में ही मनुष्य निपुण यानि निष्णात हो ! तात्पर्य यह कि बहुत विषयों के कुछ कुछ ज्ञान से केवल कुछ विषय का पूरा ज्ञान होना अच्छा है !

रविवार, 30 नवंबर 2008

उत्‍तम वाणी, सत्‍य वचन, धीर गंभीर मृदु वाक्‍य

उत्‍तम वाणी, सत्‍य वचन, धीर गंभीर मृदु वाक्‍य

मनुष्‍य को सदा उत्‍तम वाणी अर्थात श्रेष्‍ठ लहजे में बात करना चाहिये, और सत्‍य वचन बोलना चाहिये, संयमित बोलना, मितभाषी होना अर्थात कम बोलने वाला मनुष्‍य सदा सर्वत्र सम्‍मानित व सुपूज्‍य होता है । कारण यह कि प्रत्‍येक मनुष्‍य के पास सत्‍य का कोष (कोटा) सीमित ही होता है और शुरू में इस कोष (कोटा) के बने रहने तक वह सत्‍य बोलता ही है, किन्‍तु अधिक बोलने वाले मनुष्‍य सत्‍य का संचित कोष समाप्‍त हो जाने के बाद भी बोलते रहते हैं, तो कुछ न सूझने पर झूठ बोलना शुरू कर देते हैं, जिससे वे विसंगतियों और उपहास के पात्र होकर अपमानित व निन्‍दनीय हो अलोकप्रिय हो जाते हैं । अत: वहीं तक बोलना जारी रखो जहॉं तक सत्‍य का संचित कोष आपके पास है । धीर गंभीर और मृदु (मधुर ) वाक्‍य बोलना एक कला है जो संस्‍कारों से और अभ्‍यास से स्‍वत: आती है ।  

 

रविवार, 2 नवंबर 2008

उपयोगी बनो, समय का सदुपयोग करो

''चिल्‍ला कर और झल्‍ला कर बातें करना, बिना सलाह मांगे सलाह देना, किसी की मजबूरी में अपनी अहमियत दर्शाना और सिद्ध करना, ये कार्य दुनियां का सबसे कमजोर और असहाय व्‍यक्ति करता है, जो खुद को ताकतवर समझता है और जीवन भर बेवकूफ बनता है, घृणा का पात्र बन कर दर दर की ठोकरें खाता है ।''   

''जो समय को नष्‍ट करता है, समय भी उसे नष्‍ट कर देता है''''समय का हनन करने वाले व्‍यक्ति का चित्‍त सदा उद्विग्‍न रहता है, और वह असहाय तथा भ्रमित होकर यूं ही भटकता रहता है''

 

गुरुवार, 16 अक्टूबर 2008

बेवकूफों और अन्‍धों के लिये शास्‍त्र और दर्पण क्‍या कर सकते हैं

यस्‍य नास्ति स्‍वयं प्रज्ञा शास्‍त्रं तस्‍य करांति किं

लोचनाभ्‍यां विहीनस्‍य दर्पण: किं करिष्यिति

जिस मनुष्‍य में स्‍वयं का विवेक, चेतना एवं बोध नहीं है, उसके लिये शास्‍त्र क्‍या कर सकता है । ऑंखों से हीन अर्थात अन्‍धे मनुष्‍य के लिये दर्पण क्‍या कर सकता है ।

सोमवार, 15 सितंबर 2008

मूरख को उपदेश देने से क्‍या लाभ

उपदेशो हि मूर्खाणां प्रकोपाय न शान्‍तये ।

पय: पानं भुजंगांनां केवलं विष वर्धनम् ।।

मूर्ख को उपदेश करने का कोई लाभ नहीं है, इससे उसका क्रोध शान्‍त होने के बजाय और उल्‍टे बढ़ता ही है । जिस प्रकार सॉंप को दूध पिलाने से उसका जहर घटता नहीं बल्‍ि‍क उल्‍टे बढ़ता ही है ।

 

शनिवार, 30 अगस्त 2008

कमजोर राजा और पतले वृक्ष की शरण कभी न लें ये अवश्‍य धोखा देते हैं

रहति लटपट काटि दिन, बरू घामें मां सोय । छांह ना बाकी बैठिये, जो तरू पतरो होय ।। जो तरू पतरो होय, एक दिन धोखा दैहे । जा दिन बहै बयारि, टूटि तब जर से जैहे ।। कह गिरधर कविराय, छांह मोटे की गहिये । पाती सब झरिं जांय, तऊ छाया में रहिये ।। पतले वृक्ष अर्थात कमजोर राजा की शरण या राज्‍य में नहीं रहना चाहिये, ऐसे राजा के राज्‍य की शरण में रहने से एक दिन तगड़ा धोखा होता है और जिस दिन भी तेज हवा या आंधी चलती है, कमजोर और पतले वृक्ष जिस तरह जड़ से उखड़ कर उड़ जाते हैं, उसी तरह ऐसा राजा भी कुनबे सहित भाग निकलता है और लुप्‍त व गुप्‍त हो जाता है । भारत के प्रसिद्ध गिरधर कवि ने इस कुण्‍डली में कहा है कि सदा ही मोटे वृक्ष और भारी राजा (जिसका साम्राज्‍य पुख्‍ता हो और प्राचीन हो तथा विश्‍वसनीय कुल का हो) की ही शरण व राज्‍य का आसरा लेना चाहिये । ऐसा वृक्ष सारी पत्तियां झड़ जाने के बावजूद भी छाया और सुख प्रदान करता है, ऐसा राजा व उसका राज्‍य भी सब कुछ व्‍यतीत हो जाने या नष्‍ट हो जाने पर भी सुख व समृद्धि देता है । अन्‍यथा भीषण लपट और घाम (तेज धूप) रहते हुये भी बिना वृक्ष के खुले में बैठकर कष्‍ट भोगना उत्‍तम है- गिरधर कवि की कुण्‍डली भारत के अति मान्‍य प्राचीन कवि